माया और जीव

नमो नारायण
नारायण! 
किसी कपड़े पर बने हुए चित्रों में बना हुआ घर,घर का आंगन, घर में रखा हुआ लकड़ी का खाट, उस खाट के पाये से बंधी हुई बकरी,उस बकरी के बच्चे से खेलता हुई छोटी सी लड़की, और उस लड़की के पहने हुए कपड़े, थोड़ी दूर पर बैठी उसकी मां और उस मां के पहने हुए साड़ी और ब्लाऊज़, ये सभी चीजें भिन्न भिन्न रूप और नाम वाली होते हुए भी कपड़ा ही हैं नारायण।
वो साड़ी जिसका रंग हल्का पीला है, और वो ब्लाउज जिसका रंग क्रीम कलर का है , ये कपड़े के आश्रित कपड़े का चित्र वास्तविक नही, वो घर वो लकड़ी का खाट लकड़ी नहीं, कपड़े में लकड़ी का चित्र है। वो बकरी, वो बच्ची, वो मां सच नहीं, कपड़े के आधार पर बने हुए चित्र हैं।
इसी तरह एक चैतन्य के आश्रय में चित्त रूपी कलाकार चलते फिरते जगत की कल्पना करके भिन्न भिन्न प्रकार की ‌वस्तु स्थान संबंध जड़, जीव जैसे तमाम इंद्रजाल की रचना कर देता है।
और 
उसी मायिक जगत में अप्राप्ति के प्राप्ति के लिए कठोर परिश्रम करता हुआ यह मनुष्य, प्राप्ति में हर्ष और अप्राप्ति में विषाद को उपलब्ध होता रहता है।
नारायण! 
जैसे सभी चित्रों का आधार कपड़े का वह पर्दा है,उस कपड़े में ही कपड़े का भी चित्रण है। वैसे ही इस चैतन्य के ‌आधार पर चैतन्य को प्राप्त करने का प्रयास है।

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