संदेश

उद्बबोध

कौन कहता है कि तुम जीव हो? कौन कहता है कि तुम बद्ध हो? कौन कहता है कि तुम अपने कर्मो का फल भोगने के लिए जन्म लेते हो और फल भोगने के लिए कर्म करते हो?  ये सारी बातें तुमने जिन शास्त्रों, वेदों, उपनिषदों मे पढी़ हैं, उन्हीं मे आगे और पढो़। आगे भी लिखा है कि तुम ईश्वर अंश हो, उससे आगे ये भी लिखा है कि तुममें और ईश्वर मे मात्र एक अ का अंतर है यानि अज्ञान और ज्ञान का । और आगे पढो़, लिखा है तुम स्वयं ईश्वर ही हो । और पढो़ आगे लिखा है यह स्ंपूर्ण जगत तुम्हारा ही विनोद है। तुम्हारे दुख का कारण कोई ईश्वर कोई जगत कोई कर्म कोई कर्म फल नहीं, केवल तुम्हारा अज्ञान है । उठो,  जागो आत्मनिष्ठ होओ अमरत्व को प्राप्त होकर निर्भय हो जाओ । ॐनमो नारायण

माया और जीव

चित्र
नमो नारायण नारायण!  किसी कपड़े पर बने हुए चित्रों में बना हुआ घर,घर का आंगन, घर में रखा हुआ लकड़ी का खाट, उस खाट के पाये से बंधी हुई बकरी,उस बकरी के बच्चे से खेलता हुई छोटी सी लड़की, और उस लड़की के पहने हुए कपड़े, थोड़ी दूर पर बैठी उसकी मां और उस मां के पहने हुए साड़ी और ब्लाऊज़, ये सभी चीजें भिन्न भिन्न रूप और नाम वाली होते हुए भी कपड़ा ही हैं नारायण। वो साड़ी जिसका रंग हल्का पीला है, और वो ब्लाउज जिसका रंग क्रीम कलर का है , ये कपड़े के आश्रित कपड़े का चित्र वास्तविक नही, वो घर वो लकड़ी का खाट लकड़ी नहीं, कपड़े में लकड़ी का चित्र है। वो बकरी, वो बच्ची, वो मां सच नहीं, कपड़े के आधार पर बने हुए चित्र हैं। इसी तरह एक चैतन्य के आश्रय में चित्त रूपी कलाकार चलते फिरते जगत की कल्पना करके भिन्न भिन्न प्रकार की ‌वस्तु स्थान संबंध जड़, जीव जैसे तमाम इंद्रजाल की रचना कर देता है। और  उसी मायिक जगत में अप्राप्ति के प्राप्ति के लिए कठोर परिश्रम करता हुआ यह मनुष्य, प्राप्ति में हर्ष और अप्राप्ति में विषाद को उपलब्ध होता रहता है। नारायण!  जैसे सभी चित्रों का आधार कपड़े का वह...

रामचरितमानस

जगत प्रकाश प्रकाशक रामू। माया धीस ज्ञान गुन धामू।। "जगत प्रकाश ":- ये सारा जगत क्या है इंद्रियों का विषय है। पांचों इंद्रियों के पांच विषयों का समूह है जगत। शब्द, स्पर्श, रूप -रंग , रस , और गंध इनका अनुभव होता है कान, त्वचा, आंख, जिह्वा और नाक से। लेकिन केवल इंद्रियां और विषयों का संयोग ही कारण नहीं है। मुख्य हैं चेतना , चैतन्यता, ज्ञान बोध। जिसके उपस्थिति में ही इंद्रियां मन बुद्धि और चित्त संचालित होते हैं। यदि चेतना न हो तो शरीर और इंद्रियों के संपर्क का आभास किसे होगा?  माया धीस:-माया पर आधिपत्य है जिसका लेकिन ये माया है क्या?  नारायण! यदि धृष्टता लगे तो क्षमा कीजिएगा। काई का जन्म जल में जल के कारण ही होता है और वही काई जल को ढककर जल में ही सिद्ध होती है। बादल का जन्म आकाश में ही होता है और बादल आकाश को ढककर अपने अस्तित्व को सिद्ध करता है। माया भी ब्रह्म में ही उत्पन्न होकर ब्रह्म को ढककर स्वयं को सिद्ध करती है। एक सच्चाई कहूं! ईश्वर भी बिना माया के सिद्ध नही हो सकते। और जीव भी नही।फर्क केवल इतना है कि ईश्वर के अधीन माया है। और माया के अधीन जीव है। इसलिए कहा माया धीस...